manual scavenging act
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Manual Scavenging Act

  • The removal of untreated excreta from dry toilets or pit latrines. It also involves moving the excreta using brooms, tin plates, into baskets, which the workers carry to the disposal location.
  • The Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 was enacted after the Supreme Court’s decision to control the problem of Manual Scavenging in order to protect the dignity and rights of Manual Scavengers as well as to control the problem of open defecation and to control the death associated with cleaning of septic tanks.

Provisions of the Manual Scavenging Act

  • National Safai Karam Chari Board- It is the major monitoring and implementing agency of this Act guided by Articles 17(Untouchability), 21(Life and Liberty), 39(State principles), 41(Right to work) of the Constitution.
  • The Act gives special focus on two organisations i.e., Indian Railways and Municipality, which employ the largest number of Manual Scavengers and cleaners in the world.
  • This act provides the status of semi-skilled and skilled labourers instead of unskilled labourers to Manual Scavengers.
  • This act ensures the availably of minimum gadgets to Manual Scavengers like Gloves, Boots, Helmet, Mask, Machines, etc.
  • Every household in rural and urban areas should construct toilets and should not employ any person as Manual Scavengers.
  • In case of employment of any person as a Manual Scavenger, then
    First time punishment- Rs 2lakh fine and 2years imprisonment.
    Second time punishment- Rs 5lakh fine and 5years imprisonment.
  • In case if toilets are not constructed in houses, then

First time punishment- Rs 50,000 fine and 2years imprisonment.

Second time punishment- Rs 2lakh fine and 5yrs imprisonment.

  • Provision of educational scholarships to the children of manual scavengers so as to reduce the percentage of school dropouts.
  • Free allotment of land for construction of houses and subsidised loan for construction of houses to the Manual Scavengers to improve their conditions of living in the society.
  • Provision of vocational education to empower their children and to provide employment to their children.
  • Provision of free legal aid to the manual scavengers through NALSA (National Legal Services Authority) by giving free lawyer, free travel allowance to the Manual Scavengers in the case of any atrocities being faced by them.
  • Issuing Biometric cards to them to provide them with subsidies.

Criticism of the Manual Scavenging Act

  • The Safai Karamchari Board consists only a few Manual Scavengers and not all of them, which prevents the ones left out from taking advantage of the provisions of the Act.
  • Manual savaging is a problem of cultural, attitudinal, behavioural change, so instead of legislation, people should be made aware of the scavengers’ lives, rights and their dignity.
  • The availability of gadgets to scavengers is not adequate.
  • Still, there are dry toilets in some backward areas, for which scavengers are needed to clean them up.
  • Their children are not properly using the vocational education training programme and scholarships and are continuing the same scavenging job.
  • Therefore, there is still a dire need to bring these people to mainstream Indian society and Indian economy.

१९९३ का कानून (मैला ढोना )

  •  सूखे शौचालयो या गड्ढो में मानव द्वारा त्यागेगए मल – मूत्र एवम अपशिष्टो को झाड़ू से साफ़ करके उन्हें टिन के पत्तियों से उठाकर टोकरी में रख कर उन्हें निपटाने वाले स्थान तक उन सभी अपशिष्टो को ढो कर ले जाने वाले कर्मचारी !
  • मैला ढोने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति को निषेध मानते हुए एवम उनके पुनर्वास कानून २०१३ को  सुप्रीम कोर्ट ने  मैला ढोने की समस्या को नियमित करने के लिए अधिनियमित किया | इन कर्मचारियों की प्रतिष्ठा और उनके अधिकारों के रक्षा करने के लिए एवम खुले में शौच की समस्या को ख़त्म करने में तथा सेप्टिक टैंको की सफाई में जान की जोखिम को ख़त्म करना इस कानून की  प्रतिबद्धता थी |

 मैला कर्मचारी के अधिनियम के प्रावधान –

  • राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी बोर्ड– यह इस अधिनियम की एक प्रमुख निगरानी एवम परिपालन करने वाली एजेंसी है जिसका सञ्चालन संविधान के  अनुच्छेद १७ (अश्पृश्यता उन्मूलन), २१ (जीवन एवम स्वछंदता ), ३९ (राज्य अनुशासन ,४१ (कार्य करने का अधिकार द्वारा होता है |
  • यह अधिनियम उन दो संस्थाओ,१ – भारतीय रेलवे , २- नगर निगम पर अधिक केन्द्रित होता है क्योकि इन संस्थाओ में दुनिया के सबसे अधिक सफाई कर्मी और मैला श्रमिक कार्य करते है|
  • यह  अधिनियम अकुशल की बजाये अर्ध कुशल एवम निपुण होने की स्थिति प्रदान करता है|
  • यह  अधिनियम मैला श्रमिको की सुरक्षा हेतु उन्हें न्यूनतम एवम उपयुक्त औजारो जैसे दस्ताने, जूते, हेलमेट, मास्क, एवम स्वचालित मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है |
  • ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रो के पारिवारिक आवासों में शौचालयो का निर्माण होना चाहिए एवम किसी भी व्यक्ति को मैला ढोने का कार्य नही सौपा जाना चाहिए |
  • किसी व्यक्ति को मैला ढोने के कार्य के लिए नियुक्त किये जाने की स्तिथि में दोषी पाए जाने पर

प्रथम दृष्टया दोषी होने पर- २ लाख रूपये अर्थदंड और  २ साल की जेल की सजा

द्वितीय बार दोषी पाए जाने पर- ५ लाख रूपये का अर्थ दंड और  ५ साल की जेल
की सजा |

  •  घरो में शौचालय के निर्माण ना होने की स्तिथि में –

    प्रथम बार दोषी – ५०००० रूपये अर्थदंड और २ साल जेल

    द्वितीय बार दोषी होने पर – २ लाख अर्थदंड और २ साल की सजा |

  • मैला श्रमिको के बच्चो की शिक्षा हेतु उन्हें शैक्षणिक छात्रवृत्ति का भी प्रावधान है जिससे वो विद्यालय जा सके
  • भूमि का मुफ्त में आवंटन एवम गृहों के निर्माण हेतु सब्सिडी प्राप्त ऋणों की व्यवस्था करना जिससे मैला श्रमिको की सामाजिक जीवन एवम स्थिति में सुधार हो |
  • मैला श्रमिको के बच्चो को व्यावसायिक शिक्षा एवम रोजगार प्रदान करने का प्रावधान |
  • राष्ट्रीय विधिक प्राधिकरण द्वारा मुफ्त में कानूनी सहायता का प्रावधान जिसके अंतर्गत यदि वह किसी प्रकार के अत्याचार का सामना कर रहा हो तो मुफ्त में वकील, मुफ्त में यात्रा की सुविधा  |
  • सब्सिडियो के उपयोग के लिए उनके बायोमेट्रिक कार्ड को इशू करना |

मैला श्रमिक अधिनियम की आलोचना

  •  सफाई कर्मचारी बोर्ड केवल कुछ मैला श्रमिको को ही प्रभावित कर पाता है हर एक को नहीं जिससे इस अधिनियम के प्रावधानों के फायदों से एक बड़ा तबका दूर रह जाता है |
  • मैला ढोने की प्रथा एक सांस्कृतिक एवम व्यवहार से सम्बंधित समस्या है जिसका उपचार विधिक प्रक्रियाओ से करने की बजाये जनता को मैला श्रमिको के जीवन, अधिकार एवम प्रतिष्ठा के प्रति जागरूक बनाना चाहिए |
  • औजारों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है |
  • अभी भी कुछ पिछड़े हुए क्षेत्रो में शुष्क शौचालय पाए जाते है जहा पर मैला श्रमिको को उन्हें साफ़ करके फेंकना पड़ता है |
  • उनके बच्चे  व्यावसायिक शिक्षा, शैक्षंणिक छात्र वृत्ती और प्रशिक्षण को ठीक से अपना नहीं पा रहे है जिसके कारण वे अपने पुरखो की परम्परा के अनुसार मैला ढो रहे है |
  • इसलिए आज भी इन्हें भारतीय अर्थ व्यवस्था एवम समाज के मुख्य धारा में लाना अत्यंत आवश्यक है |

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