ISRO GSLV-MkIII hindi
Source: Wikimedia
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इसरो जून में भारत का सबसे शक्तिशाली रॉकेट लॉन्च करने वाला है 

  • भारत जून के पहले सप्ताह में अभी तक का अपना सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली रॉकेट लॉन्च करने का प्रयास करेगा।
  • 640 टन के जीओसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन-मार्क III (जीएसएलवी एमके III) 10 वर्षों से अधिक समय से इसपर कार्य हो रहा है |
  • इस 640 टन के रॉकेट को विकसित करने में 10 साल से ज्यादा समय लगा तथा इसका क्रायोजेनिक इंजन बड़ा है
  • इस रॉकेट का उल्लेखनीय पहलू यह है कि इसके मुख्य और बड़े क्रायोजेनिक इंजन को भारत में विकसित किया गया है।
  • आज की स्थिति में, इसरो में 2.2 टन तक की पेलोड लांच करने की क्षमता है तथा इससे ऊपर के लिए उसे एरियान या अन्य लॉन्च वाहन की सुविधा का लाभ लेना होगा इसलिए यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
  • रॉकेट की डिजाइन की गयी क्षमता 4 टन की है तथा जीएसएलवी एमके -III के भविष्य के उड़ानों का पेलोड धीरे-धीरे बढ़ेगा।
  • जीओसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च वाहन- मार्क्स III एक खेल परिवर्तक है जो श्रीहरिकोटा से 4 टन वाले उपग्रहों को लॉन्च करने में सक्षम है तथा यह एक भारतीय तीसरा चरण का क्रायोजेनिक तथा वर्तमान जीएसएलवी के मुकाबले उच्च पेलोड वाला है।

Read in English:ISRO To Launch India’s Heaviest, Most Powerful Rocket In June

 

इसके द्वारा ढोने वाले उपग्रहों के बारे में

  • यह संचार उपग्रह जीएसएटी -19 ले जाएगा।
  • कक्षा में लगाए जाने वाले उपग्रह का वजन 3.2 टन होगा और भारतीय रॉकेट द्वारा उठाया जाने वाला अब तक का सबसे बड़ा उपग्रह होगा।
  • उन्नत अंतरिक्ष यान प्रौद्योगिकियों की तैनाती के अलावा यह उपग्रह एक भू-स्तरीय विकिरण स्पेक्ट्रोमीटर के साथ ‘का’ और ‘कू’-बैंड पेलोड ले जाएगा जो कि अंतरिक्ष विकिरण अनुसंधान में सहायता करेगा।

 इसरो के अन्य रॉकेट

  • भारत में वर्तमान में दो रॉकेट हैं- ध्रुवीय उपग्रह लॉन्च वाहन (पीएसएलवी) और जीएसएलवी-एमके द्वितीय – 415 टन का लिफ्ट-ऑफ द्रव्यमान तथा 2.5 टन ढोने की क्षमता वाला।
  • इसी महीने की शुरुआत में जीएसएलवी-एमके द्वितीय का इस्तेमाल संचार उपग्रह को शुरू करने के लिए किया गया था जिसे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षिण एशिया में पड़ोसियों के साथ साझा कर उपहार स्वरूप दिया था।
  • दक्षिण एशिया सैटेलाइट भाग लेने वाले देशों को बैंक एटीएम और ई-गवर्नेंस के लिए टेलीविज़न सेवाओं और संचार प्रौद्योगिकी में मदद करेगा तथा सेलुलर नेटवर्क के लिए बैकअप के रूप में भी काम कर सकता है विशेषकर उन स्थानों पर जहां स्थलीय कनेक्टिविटी कमज़ोर होती है।

 

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